कट्टरपंथी इस्लामिक बादशाह औरंगज़ेब भी इस शिवलिंग को हिला न पाया

कानपुर शहर जहाँ  इतिहास और इससे जुड़ी चीजें आज भी जीवित हैं। कानपुर में जहां मुगलशासक से लेकर अंग्रेजों द्वारा बनाई गई इमारतें आज भी विद्यमान हैं, वहीं गोरों की इमारतें इतने साल बीत जाने के बाद भी मौजूद हैं। मुग़ल शासन काल के दौरान शहर में स्थापित हिन्दुओं के अनेक मंदिर तोड़ दिए गए लेकिन कानपुर देहात के छोटे से गांव बनीपरा में स्थापित एक शिवमन्दिर ऐसा भी है जिसे औरंगजेब भरपूर कोशिश करने के बाद भी नहीं तोड़ सका। औरंगजेब ने इस शिव मंदिर की दिवारों को तोड़ दिया था, शिवलिंग के पास उसके सैनिक नहीं पहुंच पाए थे। हजारों सैनिकों की फौज शिवलिंग को नेस्तानबूद करने के लिए तोप और गोलों के साथ भेजा था। सैनिक एक माह तक मंदिर के अंदर विराजमान शिव लिंग को तोड़ने के लिए दिन रात जुटे रहे, तोप से सैकड़ों गोले दागे, लेकिन वह मंदिर के पास पहुंचने से पहले पटाखा बनकर फुस्य हो जाते। औरंगजेब जब शिवलिंग की नीव को नहीं डिगा पाया तो हार मानकर चुपचाप यहां से खजुहा चला गया था। मन्दिर के पुजारी ने बताया कि, यह मन्दिर महाभारत काल से इसी गांव में है और प्रलय काल तक रहेगा ।

खोदते – खोदते थक गए थे औरंगजेब के सैनिक
कानपुर देहात के छोटे से गांव बनीपारा में स्थित प्राचीन बाणेश्वर शिव का मंदिर है। मंदिर के पुजारी किशनबाबू ने बताया कि, मुगल शासक औरंगजेब ने एक बार इसे नष्ट करने की कोशिश की। लेकिन लाख प्रयास करने पर भी शिवलिंग को ना तो हटाया जा सका और न ही तोड़ा जा सका। थक हारकर औरंगजेब मंदिर परिसर पर पहुंचकर शिवलिंग की खुदाई करने के लिए एक हजार सैनिक लगवाए। सैनिक खोदते – खोदते थक गए, लेकिन शिवलिंग की गहराई की सीमा तक नहीं पहुंच पाई। हार कर औरंगजेब ने अपने सैनिकों से पुनः मिट्टी डलवा दी। पुजारी किशन बाबू का कहना है कि, राजा बाणेश्वर की बेटी ऊषा भगवान शिव की अनन्य भक्त थी। उनकी पूजा करने वह इतनी तल्लीन हो जाती थी कि, अपना सब कुछ भूलकर आधी- आधी रात तक दासियों के साथ शिव का जाप करती थी। बेटी की भक्ति को देखकर राजा शिवलिंग को महल में ही लाना चाहते थे ताकि उनकी बेटी को जगंल में न जाना पड़े और उसकी पूजा आराधना महल में ही
चलती रहे । लेकिन वह सफल नहीं हो सका |

भगवान भोले ने राजा को दिया था दर्शन
पुजारी ने बताया कि, भगवान शिव के प्रति बेटी की इस श्रद्धा व लगन को देखकर राजा बाणेश्वर ने घोर तपस्या की। कई वर्षों के बाद राजा की तपस्या से प्रसन्न होकर भोलेशंकर ने उन्हें साक्षात दर्शन दिये और वरदान मांगने को कहा। उनकी बात सुनकर राजा ने उनसे अपने महल में ही बसने की प्रार्थना की। भगवान ने उनकी इस इच्छा को पूर्ण करते हुए वे अपना एक लिंग स्वरुप उन्हे दिया किन्तु शर्त रखी कि, जिस जगह वह इस शिवलिंग को रखेगे, वैसे ही वह उसी जगह स्थापित हो जायेगा। (यह कथा रावण द्वारा स्थापित बैद्यनाथ धाम को लेकर भी है) शिवलिंग पाकर प्रसन्न राजा बाणेश्वर तुरंत अपने राजमहल की ओर चल पड़े। रास्ते में ही राजा को लघुशंका लगी। उन्हें जंगल में एक आदमी आता दिखाई दिया। राजा ने उसे शिवलिंग पकड़ने के लिए कहा और जमीन पर न रखने की बात कहीं। उस आदमी ने शिवलिंग पकड़ तो लिया, लेकिन वह इतना भारी हो गया कि, उसे शिवलिंग को जमीन पर रखना पड़ा। जब राजा बाणेश्वर वहां पहुंचे तो नजारा देख हैरान रह गए। उन्होंने शिवलिंग को कई बार उठाने की कोशिश की, लेकिन वह अपनी जगह से नहीं हिला। राजा को वहीं पर मंदिर का निर्माण कराना पड़ा, जो आज बाणेश्वर के नाम से मशहूर है।

मंदिर के पुजारी की मानें तो राजकुमारी आज भी हर रोज भोर पहर आती हैं और शिव लिंग पर पुष्प, चावल और जल चढ़ती हैं। पुजारी ने बताया कि, यह रहस्य सैकड़ों साल से लोगों के लिए कौतूहल बना हुआ है। पुजारी ने बताया कि, शाम को मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं, जब सुबह हम और गांववाले आते हैं तो मंदिर के द्वार खुले मिलते हैं। भगवान शिव की लिंग पर ताजे फल फूल चढ़े होते हैं। पुजारी ने बताया कि, कई साइंटिस्ट वा टीबी चैनल वाले आए कैमरे लगाए, लेकिन कुछ पलों के लिए उनकी आंख बंद हो जाती और राजकुमारी भगवान शंकर की पूजा कर निकल जाती। ग्रामीण कल्लू साहू के अनुसार इस मंदिर में स्थापित अद्भुत शिवलिंग के दर्शन मात्र से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। कांवड़िये सबसे पहले लोधेश्वर और खेरेश्वर मंदिर में गंगाजल अर्पित करते हैं। इसके बाद बाणेश्वर मंदिर में जल चढ़ाकर अनुष्ठान को पूरा करते हैं। गांववालों की आस्था है कि, सावन के सोमवार का व्रत रखने से सभी मुरादें पूरी होती हैं।

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