मानो या न मानो: ऐसे पैदा हुई थी गांधारी की 101 संतानें

भगवान वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत में सम्पूर्ण धर्म, दर्शन, समाज, संस्कृति, युद्ध और ज्ञान-विज्ञान की बातें शामिल हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो महाभारत में नहीं है। साजिशों से भरी इस दास्तां के गर्भ में बहुत सारे रहस्य समाए हुए हैं। जो सोचने पर मजबूर कर देते हैं की वाकई उस समय पर ऐसा हुआ होगा? जैसे गांधारी की 101 संतानों से जुड़ा हैरान कर देने वाला तथ्य।

आमतौर पर कोई भी महिला एक या जुड़वा बच्चों को जन्म देती है। बहुत कम देखने को मिलता है की 3-4 या 5 बच्चों का जन्म एकसाथ हुआ हो। महाभारत की पात्र गांधारी ने 100 पुत्रों और एक पुत्री को एकसाथ जन्म दिया था। उनकी सबसे बड़ी संतान दुर्योधन महाभारत में खलनायक के रूप में जानी-पहचानी जाती है। उनके पुत्रों को कौरवों के नाम से जाना जाता है।

गंधार नरेश की पुत्री गांधारी शिव भक्त थी। भगवान शिव ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें 100 पुत्रों की माता बनने का वरदान दिया था। गांधारी का विवाह विचित्रवीर्य के पुत्र धृतराष्ट्र से हुआ। जो जन्म से ही नेत्रहीन थे, जब गांधारी को इस बात का पता लगा तो उन्होंने नेत्रहीन होकर जीवन जीने की प्रतिज्ञा ली और अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। धृतराष्ट्र चाहते थे कि उनके भाई पाण्डू की संतान होने से पहले उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हो। उस समय ज्येष्ठ पुत्र को राजगद्दी पर बिठाया जाता था।

गांधारी के गर्भवती होने के 10 महीने गुजरने पर भी उसे संतान पैदा न हुई। पाण्डू की पत्नी कुंती के गर्भ से युधिष्ठिर का जन्म हो गया तो गांधारी को घबराहट होने लगी। उन्होंने अपने पेट पर प्रहार कर गर्भ को गिरा दिया, जिससे गर्भपात हो गया और मांसपिण्ड बाहर निकल आए।

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तब हस्तिनापुर में महर्षि व्यास आए उन्होंने गांधारी से कहा, “भगवान शिव का वरदान कभी व्यर्थ नहीं जा सकता। वो मांस का पिंड मेरे पास ले आओ व जल्दी से सो कुंड तैयार करवाओ और उनको घी से भरवा दो।”

व्यास जी ने जल छिड़का, जिससे उस पिण्ड के अंगूठे के पोरुये के बराबर सौ टुकड़े हो गये। उन टुकड़ों को गान्धारी के बनवाये सौ कुण्डों में रखवा दिया गया। कुण्डों को दो वर्ष बाद खोलने का आदेश देकर वह अपने आश्रम चले गये। दो वर्ष के बाद जब कुण्डों को खोला गया तो उसमें से 100 पुत्रों और 1 पुत्री ने जन्म लिया।

दैत्य गुरु शुक्राचार्य के 5 टिप्स जो जीवन के हर मोड़ पर आएंगी हर किसी के काम

देवताओं के गुरु बृहस्पति हैं तो दैत्यों के शुक्राचार्य। दोनों ही भगवान ब्रह्मा के वंशज हैं। वैसे तो दैत्यों की कोई बात अच्छी नहीं थी लेकिन दैत्यगुरु शुक्राचार्य एक बेहतरीन मैनेजमेंट गुरु थे। उन्होंने एक नीति ग्रंथ की रचना भी की थी जिसे शुक्र नीति के नाम से जाना जाता है। उन्होंने कम शब्दों में बहुत काम की बातें कही हैं। शुक्राचार्य ने अपनी नीतियों में जो बताया है वो आज भी हमारे जीवन पर वैसा ही लागू होता है।

ये हैं दैत्य गुरु शुक्राचार्य की पांच नीतियां जिनसे हमें बेहतर जीवन की सीख मिलती है।

1. कल की सोचें, लेकिन कल पर न टालें
नीति – दीर्घदर्शी सदा च स्यात्, चिरकारी भवेन्न हि।

अर्थात – मनुष्य को अपना हर काम आज के साथ ही कल को भी ध्यान में रखकर करना चाहिए, लेकिन आज का काम कल पर टालना नहीं चाहिए। हर काम को वर्तमान के साथ-साथ भविष्य की दृष्टी से भी सोचकर करें, लेकिन किसी भी काम को आलय के कारण कल पर न टालें। दूरदर्शी बने लेकिन दीर्घसूत्री (आलसी, काम टालने वाला) नहीं।

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2. बिना सोचे-समझे किसी को मित्र न बनाएं
यो हि मित्रमविज्ञाय याथातथ्येन मन्दधीः।

मित्रार्थो योजयत्येनं तस्य सोर्थोवसीदति।।

अर्थात – मनुष्य को किसी को भी मित्र बनाने से पहले कुछ बातों पर ध्यान देना बहुत ही जरूरी होता है। बिना सोचे-समझे या विचार किए किसी से भी मित्रता करना आपके लिए नुकसानदायक हो सकता हैं। मित्र के गुण-अवगुण, उसकी आदतें सभी हम पर भी बराबर प्रभाव डालती हैं। इसलिए, बुरे विचारों वाले या गलत आदतों वाले लोगों से मित्रता करने से बचें।

3. किसी पर भी हद से ज्यादा विश्वास न करें
नीति -नात्यन्तं विश्र्वसेत् कच्चिद् विश्र्वस्तमपि सर्वदा।

अर्थात – आर्चाय शुक्रचार्य के अनुसार, चाहे किसी पर हमें कितना ही विश्वास हो, लेकिन उस भरोसे की कोई सीमा होनी चाहिए। किसी भी मनुष्य पर आंखें बंद करके या हद से ज्यादा विश्वास करना आपके लिए घातक साबित हो सकता है। कई लोग आपके विश्वास का गलत फायदा उठाकर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। इसलिए, इस बात का ध्यान रखें कि अपने विश्वसनियों पर विश्वास जरूर करें लेकिन साथ में अपनी भी आंखें खुली रखें।

4. न करें अन्न का अपमान
नीति- अन्नं न निन्घात्।।

अर्थात – अन्न को देवता के समान माना जाता है। अन्न हर मनुष्य के जीवन का आधार होता है, इसलिए धर्म ग्रंथों में अन्न का अपमान न करने की बात कही गई है। कई लोग अपना मनपसंद खाना न बनने पर अन्न का अपमान कर देते हैं, यह बहुत ही गलत माना जाता है। जिसके दुष्परिणाम स्वरूप कई तरह के दुखों का सामना भी करना पड़ सकता है। इसलिए ध्यान रहे कि किसी भी परिस्थिति में अन्न का अपमान न करें।

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5. धर्म ही मनुष्य को सम्मान दिलाता है
नीति- धर्मनीतिपरो राजा चिरं कीर्ति स चाश्नुते।

अर्थात- हर किसी को अपने जीवन में धर्म और धर्म ग्रंथों का सम्मान करना चाहिए। जो मनुष्य अपनी दिनचर्या का थोड़ा सा समय देव-पूजा और धर्म-दान के कामों को देता है, उसे जीवन में सभी कामों में सफलता मिलती है। धर्म का सम्मान करने वाले मनुष्य को समाज और परिवार में बहुत सम्मान मिलता है। इसलिए भूलकर भी धर्म का अपमान न करें, न ही ऐसा पाप-कर्म करने वाले मनुष्यों की संगति करें