मंदिर हैं दो लेकिन मूर्ती है एक, रोज VIP सुरक्षा में पुजारी की गोद में एक मंदिर से दूसरे में जाती है मां की मूर्ती

महाभारतकालीन बेरी के मां भीमेश्वरी देवी मंदिर में नवरात्र के पहले दिन रविवार को आसपास के जिलों व राज्यों के हजारों श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना की। यह मां का इकलौता ऐसा धार्मिक स्थल है, जहां मां की मूर्ति तो एक है, लेकिन मंदिर दो हैं। हररोज सुबह 5 बजे मां को शहर के अंदर वाले मंदिर से लगभग 700 मीटर दूर बाहर वाले भव्य मंदिर में ले जाया जाता है।

पुलिस सुरक्षा के बीच दोपहर साढ़े 12 बजे बाहर वाले मंदिर से दोबारा मां की सवारी अंदर वाले मंदिर की ओर चलती है। पुजारी मां को गोदी में लेकर पैदल ही चलते हैं। मान्यता है कि पूरी रात माता यहीं विश्राम करती हैं। मां को भोग लगाने के बाद यहां भी दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं की लंबी लाइन लगती है।

हिंगजाल पर्वत से भीम की गोद में बेरी आई थीं माता

मान्यता है कि बेरी में मां की मूर्ति को पांडु पुत्र भीम पाकिस्तान के हिंगजाल पर्वत से लाए थे। महाभारत के दौरान कृष्ण ने भीम को कुल देवी से युद्ध में विजयश्री का आशीर्वाद लेने भेजा था। भीम ने मां को साथ चलने के लिए कहा तो मां ने कहा कि मैं तुम्हारे साथ तो चलूंगी, लेकिन तुम मुझे अपनी गोद में रखोगे। रास्ते में जहां भी उतारोगे मैं उस स्थान से आगे नहीं जाऊंगी।

बेरी कस्बे में लघुशंका के लिए मां को जंगल में तालाब किनारे उतारना पड़ा। इसके बाद मां यहीं स्थापित हो गईं। युद्ध के बाद गंधारी ने मां का मंदिर बनवाया।

यूं पड़ी दो मंदिरों की परंपरा

मां भीमेश्वरी देवी मंदिर के पुजारी पुरुषोतम वशिष्ठ ने बताया कि दुर्वासा ऋषि ने मां को जंगल में देख आग्रह किया था कि अाप शहर में बने साधुओं के डेरे में विराजमान हों। इस पर मां शहर के अंदर वाली मंदिर में भी विराजमान हुईं।

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