चीता पीछे हो तो कितना तेज भागे शिकार- कैसे बच निकलते हैं हिरण और जेब्रा

कहते हैं कि चीता पीछे हो तो इंसान और भी तेज भागता है. लेकिन तेज भागने वाले शिकारी जानवरों से बचने के लिए सिर्फ तेज भागना ही काफी नहीं है. एक रिसर्च ने इस बारे में कुछ नई जानकारियां सामने आई हैं.

पर्यावरण से जुड़ी पत्रिका नेचर ने जंगल के शिकारी जीवों और उनके शिकार के बारे में एक रिपोर्ट छापी है. शेर और चीता काफी तेज, मजबूत और अपने शिकार की तुलना में स्फूर्तिमान होते हैं लेकिन जेब्रा और मृग अपनी अकस्मात रणनीतियों से इसकी भरपाई कर लेते हैं. रिसर्चरों का कहना है कि अधिकतम रफ्तार पर भागना एक घातक गलती हो सकती है, इसकी बजाय थोड़ा धीमे भागना और शिकारियों को अपने अगले कदम के बारे में सोचते रहने पर विवश करना ज्यादा कारगर है.

रिपोर्ट के प्रमुख लेखक एलन विल्सन यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के रॉयल वेटरिनरी कॉलेज में प्रोफेसर हैं. प्रोफेसर एलन विल्सन कहते हैं, “अगर शिकार एक ही रफ्तार से भाग रहा है तो वह अपनी गति नहीं बढ़ा पाएगा और उसकी चाल का अंदाजा लगाया जा सकता है, कम रफ्तार शिकार के बचने के लिए फायदेमंद है क्योंकि यह जानवरों को युक्ति लगाने का मौका देता है.” इसका सबूत मिलता है शिकार की दर से. शेर जेब्रा का शिकार करते हैं जबकि चीता मृग को निशाना बनाते हैं. इनके शिकार के तीन प्रयासों में दो नाकाम रहे.

उत्तरी बोत्सवाना के सावन्ना मैदान से रिसर्च के लिए आंकड़े जुटाए गए. इसके लिए नौ शेरों, पांच चीतों, सात जेब्रा और सात मृगों में उच्च तकनीक वाले कॉलर लगाए गए. सारे जानवर जंगली थे और मुक्त रूप से विचरण करने वाले. करीब 5,500 किलोमीटर की तेज रफ्तार दौड़ में कॉलर ने जगह, गति, फुर्ती, कदमों की संख्या, हर सेकेंड में मुड़ने की क्षमता को दर्ज किया और इन आंकड़ों से बहुत सी जानकारी मिली है. इसके साथ ही रिसर्चरों ने मांसपेशियों की ताकत को नापने के लिए बायोप्सी किया जैसे कि दुनिया के शीर्ष एथलीटों की जाती है.

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नतीजे बताते हैं कि शेर और चीता अपने शिकार की तलुना में ज्यादा हट्टे कट्टे हैं, उनकी गति 38 फीसदी तेज है, फुर्ती 37 फीसदी बेहतर है और तेजी से धीमे होना हो तो वो 72 फीसदी बेहतर हैं. उनकी मांसपेशियां भी 20 फीसदी ज्यादा ताकतवर हैं. इन सब मामलों में बेहतर होने के बावजूद जेब्रा और मृग उनसे बच निकलते हैं क्योंकि उनकी चाल का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. महज एक या दो कदम की दूरी से वो अपने शिकारियों को चकमा दे जाते हैं. विल्सन ने कहा, “वे शिकार का सीमांकन करते हैं और जानते हैं कि केवल भागना नहीं है बल्कि आखिरी क्षण में मुड़ जाना है.”

अफ्रीकी सावन्ना में पिछले हजारों सालों या फिर शायद लाखों सालों से शिकार और शिकारी मौजूद हैं और विकास की होड़ में हिस्सा ले रहे हैं. गुजरते समय के साथ शेर, चीते, बाघ बेहतर शिकारी बन गए हैं तो उनका आहार बनने वाले जीवों ने उनके जबड़े में जाने से बचने के लिए खुद को नए तरीके से ढाल लिया है. हालांकि जाति के आधार पर शिकारी और शिकार का रिश्ता अब भी वैसा ही है जैसा सदियों पहले था यानि कि शेर मृग के पीछे नहीं भागते और चीते जेब्रा को देख अपना मुंह फेर लेते हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि जेब्रा चीते से अपना बचाव कर सकता है जबकि मृग अगर बीमार ना हों तो शेरों को चकमा दे सकते हैं.