आइये जानते हैं शिवलिंग सही परिक्रमा विधी और पूजन का सही तरीका- गलत विधी पड़ सकती है भारी

शिवलिंग की परिक्रमा

शंकर जी को भोलेनाथ इसलिए कहते हैं क्योंकि अपने भक्त के थोड़ी से ही कष्ट से इनका मन दुखी हो जाता है और उनकी हर मनोकामना पूरी कर देते है। वहीं अगर नाराज होते हैं तो रूद्र बन जाते हैं। अगर आप भी भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग की पूजा करने के बाद इस तरीके से परिक्रमा लगाते हैं तो उसका फल मिल सकता है उल्टा।

आइये जानते है कि शिव जी की पूजा कब और कैसे करनी चाहिए?

सावन के महीने में शिवलिंग की पूजा की जाती है लिंग सृष्टि का आधार है और शिव विश्व कल्याण के देवता है। वैसे तो शिव जी की पूजा में कोई विशेष नियम की बाध्यता नहीं है। क्योंकि शिव बहुत ही भोले है वो सिर्फ भाव के भूखे है।

शास्त्रों में शिवलिंग पूजा के कुछ नियम-विधान बताये गये है।

  • जिस जगह पर शिवलिंग स्वथापित हो, उससे पूर्व दिशा की ओर मुख करके नहीं बैठना चाहिए।
  • शिवलिंग से उत्तर दिशा में भी न बैठें। क्योंकि इस दिशा में भगवान शंकर का बॉया अंग होता है एंव शक्तिरूपा देवी उमा का स्थान होता है।
  • पूजा के दौरान शिवलिंग से पश्चिम दिशा में बैठना भी उचित नहीं रहता है। क्योंकि इस दिशा में भोले बाबा की पीठ होती है। जिस कारण पीछे से देवपूजा करने से शुभ फल नहीं मिलता है।
  • शिवलिंग से दक्षिण दिशा में ही बैठकर पूजन करने से मनोकामना पूर्ण होती है।
  • उज्जैन के दक्षिणामुखी महाकाल और अन्य दक्षिणामुखी शिलिंग पूजा का बहुत अधिक धार्मिक महत्च है।
  • शिवलिंग पूजा में दक्षिण दिशा में बैठकर करके साथ में भक्त को भस्म का त्रिपुण्ड लगाना चाहिए, रूद्राक्ष की माला पहननी चाहिए और बिना कटे-फटे हुये बिल्वपत्र अर्पित करना चाहिए।
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अन्य सावधानियां

  1. शिवलिंग की कभी पूरी परिक्रमा नहीं करनी चाहिए। आधी परिक्रमा करना ही शुभ होता है।
  2. अगर आप परिक्रमा के दौरान शिवलिंग के चारों ओर घूम रहे हैं तो आप भी वही गलती कर रहे हैं जिससे भगवान शिव नाराज होते हैं।
  3. शिवपुराण के अनुसार शिवलिंग की परिक्रमा के दौरान आधी परिक्रमा करें और फिर वापस लौटकर दूसरी परिक्रमा करनी चाहिए।
  4. शिवपुराण के अनुसार कोई भी शिवलिंग की जल की निकासी यानि कि निर्मली को लांघेगा वह पापी कहलाएगा और उसके भीतर की शक्ति छीन ली जाती है। इसलिए निर्मली तक परिक्रमा करनी चाहिए, यानि की आधी परिक्रमा।
  5. शिवलिंग के चारों ओर घूमकर परिक्रमा करने से दोष लगता है और व्यक्ति पुण्य के बजाय पाप का भागी बनता है।

निम्न प्रकार से अभिषेक का फल

  1. दूध से शिव जी का अभिषेक करने पर परिवार में कलह, मानसिक अवसाद व अनचाहे दुःख व कष्टों आदि का निवारण होता है।
  2. वंश वृद्धि के लिए घी की धारा डालते हुये शिव सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए।
  3. इत्र की धारा डालते हुये शिव का अभिषेक करने से भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है।
  4. जलधारा डालते हुये शिव जी का अभिषेक करने से मानसिक शान्ति मिलती है।
  5. शहद की धारा डालते हुये अभिषेक करने से रोग मुक्ति मिलती है। परिवार में बीमारियों का अधिक प्रकोप नहीं रहता है।
  6. गन्ने के रस की धारा डालते हुये अभिषेक करने से आर्थिक समृद्धि व परिवार में सुखद माहौल बना रहता है।
  7. शिव जी को गंगा की धारा बहुत प्रिय है। गंगा जल से अभिषेक करने पर चारो पुरूषार्थ की प्राप्ति होती है। अभिषेक करते समय महामृत्युंजय का जाप करने से फल की प्राप्ति कई गुना अधिक हो जाती है। ऐसा करने से मॉ लक्ष्मी प्रसन्न होती है।
  8. सरसों के तेल की धारा डालते हुये अभिषेक करने से शत्रुओं का शमन होता, रूके हुये काम बनने लगते है व मान-सम्मान में वृद्धि होती है।
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शिव पूजा व पुष्प

  1. विल्वपत्र चढ़ाने से जन्मान्तर के पापों व रोग से मुक्ति मिलती है।
  2. कमल पुष्प चढ़ाने से शान्ति व धन की प्राप्ति होती है।
  3. कुशा चढ़ाने से मुक्ति की प्राप्ति होती है।
  4. दूर्वा चढ़ाने से आयु में वृद्धि होती है।
  5. धतूरा अर्पित करने से पुत्र रत्न की प्राप्ति व पुत्र का सुख मिलता है।
  6. कनेर का पुष्प चढ़ाने से परिवार में कलह व रोग से निवृत्ति मिलती हैं।
  7. शमी पत्र चढ़ाने से पापों का नाश होता, शत्रुओं का शमन व भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है।

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