“चक्रवर्ती सम्राट अशोक” मौर्य साम्राज्य को असम से इरान तक केवल आठ वर्षों में फैला दिया

अखंड भारत पर राज करने वाले सम्राट अशोक  विश्वप्रसिद्ध मौर्य साम्राज्य के एक महान सम्राट थे। उनका साम्राज्य आज तक का सबसे बड़ा साम्राज्य रहा है। वह सम्राटों के भी सम्राट थे, इसलिए उन्हें चक्रवर्ती सम्राट अशोक के नाम से जाना जाता है। वे धर्मपरायण, लोक कल्याण कार्य करने वाले और सत्य के मार्ग पर चलने वाले सम्राट थे। उनके ह्रदय में उदारता सदैव बनी रही। वह हमेशा एक हज़ार ब्राम्हणों को भोजन  कराने के बाद ही स्वयं भोजन करते थे, इसलिए उनका नाम इतिहास में एक महान परोपकारी उदार व शक्तिशाली सम्राट के नाम से अमर है।

जन्म व बचपन

अशोक का जन्म पाटलिपुत्र के मौर्य साम्राज्य में हुआ था। उनकी माता का नाम धर्मा और पिता का नाम बिंदुसार था, जो मौर्य साम्राज्य के राजा थे। अशोक के पिता बिंदुसार चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र थे। अशोक के कई सौतेले भाई-बहन थे। वह बचपन से ही किसी भी कार्य को आसानी से पूर्ण कर लेते थे। एक महान सम्राट की छवि अशोक में बचपन से ही दिखाई देती थी।

प्रारंभिक जीवन

एक बार तक्षशिला में विद्रोह का माहौल हो गया, जिसका प्रांतपाल अशोक का ज्येष्ठ भाई सुशीम था। तक्षशिला में भारतीय और यूनानी मूल के लोग रहा करते थे। सुशीम अकुशल प्रशासन के कारण तक्षशिला में विद्रोह की ज्वाला जल उठी। उस विद्रोह को शांत करने के लिए अशोक के ज्येष्ठ भाई सुशीम ने अपने पिता बिंदुसार से अशोक को विद्रोह ख़त्म करने के लिए भेजा। तक्षशिला में अशोक के आने का पता चलते ही विद्रोहियों ने विद्रोह करना बंद कर दिया। अशोक की इतनी कामयाबी से उनका बहुत नाम हुआ, जिससे उनके ज्येष्ठ भाई सुशीम को अपने हाथ से राज-पाठ जाता हुआ दिखने लगा। सुशीम ने कूटनीति से अपने भाई अशोक को अपने पिता बिंदुसार द्वारा वनवास दिला दिया। अशोक वनवास के दौरान कलिंग गए, जहाँ उन्हें मत्स्यकुमारी कौर्वकी नाम की एक स्त्री से प्रेम हुआ और अशोक ने आगे चलकर मत्स्यकुमारी कौर्वकी को अपनी दूसरी या तीसरी रानी बनाया।

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अशोक के वनवास के दौरान जब फिर विद्रोह हुआ तब अशोक के पिता बिंदुसार ने उन्हें वनवास से वापस बुलवा लिया और विद्रोह को शांत करने के लिए तक्षशिला भेज दिया। सुशीम के द्वारा अशोक को मरवाने के भय से उनके पिता बिंदुसार ने अशोक की पहचान को गुप्त ही रखा। उसके उपरांत अशोक बौद्ध धर्म के आश्रम में रहने लगे, जहाँ उनको देवी  नाम की स्त्री से प्रेम हुआ और उनसे विवाह  कर लिया।

जीवन कार्य

अशोक के ज्येष्ठ भाई सुशीम से परेशान होकर प्रजा ने अशोक को राजा  बनने के लिए प्रेरित किया। जब वह बौद्ध धर्म  के आश्रम में निवास कर रहे थे, उसी दौरान उनके सौतेले भाइयों ने उनकी माँ  की हत्या कर दी। माँ की हत्या की खबर मिलते ही अशोक क्रोध से भर उठे और महल में जाकर अपने सभी भाइयों की हत्या  कर दी और फिर प्रजा के आग्रह अनुसार अशोक स्वयं  राजा बने। उनके राजा बनते ही मौर्य साम्राज्य की तीव्र गति से वृद्धि हुई और उन्होंने अपनी मौर्य साम्राज्य की सीमा को असम से लेकर इरान तक केवल आठ वर्षों में फैला दिया। इन्हीं दिनों अशोक ने कलिंग राज्य  को पाने के लिए युद्ध किया और यह युद्ध उनके जीवन में एक बहुत बड़ा बदलाव लेकर आया। यह युद्ध चार साल तक चला, इस युद्ध में मौर्य साम्राज्य के एक लाख  लोगों की मृत्यु हुई और बहुत लोग घायल हो गए। अन्तत: युद्ध में मौर्य साम्राज्य की विजय हुई और कलिंग के राजा जो बहुत बहादुरी से लड़े और आखिर में परास्त होकर मारे गए। जब अशोक युद्ध स्थल पर पहुँचे, तो वहाँ का दृश्य देखकर उनका ह्रदय अन्दर तक द्रवित होकर टूट गया। “इतना रक्तपात, इतनी हत्याएं वह भी केवल एक राज्य के लिए” ये शब्द अशोक ने अपने मन में कहे, उनको अपने ऊपर ग्लानि होने लगी कि यह उन्होंने क्या किया, केवल राज्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने इतना भीषण युद्ध किया। उसी दिन से अशोक ने युद्ध करना हमेसा के लिए समाप्त कर दिया और अपनी अध्यात्मिक उन्नति की ओर कदम बढ़ा दिया।

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कुछ वर्षों के पश्चात अशोक ने निगोथ  नाम के भिक्षुक द्वारा दीक्षा प्राप्त की। बौद्ध धर्म ग्रहण करने के पश्चात अशोक ने उसे अपने जीवन पर लागू किया और अकारण जीव हत्या व शिकार खेलना त्याग दिया। अशोक ने अपनी प्रजा को भी प्रेम व धर्म के साथ जीवन जीने के लिए प्रेरित किया, जिसके परिणामस्वरुप समाज से द्वेष, ईर्ष्या जैसी भावनाएँ समाप्त हो गई। तत्पश्चात अशोक ने अपने शासनकाल में सर्वप्रथम बोधगया  की यात्रा की। उसके बाद अशोक ने लुम्बिनी ग्राम की यात्रा की और उस ग्राम को कर (TAX) देने से मुक्त कर दिया। अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार केवल अपने साम्राज्य में ही नहीं बल्कि अलग-अलग देशों-प्रदेशों में भी किया और अशोक द्वारा ही बौद्ध धर्म विश्वधर्म बना। बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्ता को भी बौद्ध धर्म की दीक्षा दिलाई और उन्हें भिक्षु-भिक्षुणी के रूप में देशों-प्रदेशों में प्रचार करने हेतु भेजा, जिसमें अशोक के पुत्र महेंद्र प्रचार करने में अधिक सफल हुए। अशोक ने “बोद्ध धर्म” को जन-जन तक पहुँचाने के लिए अपने राज्यों में जगह-जगह गौतम बुद्ध की प्रतिमाएं स्थापित भी की थी।

मृत्यु

40 वर्ष तक शासन करने के पश्चात 232 ईसा पूर्व में चक्रवर्ती सम्राट अशोक का स्वर्गवास हुआ। उन्होंने अपना जीवन एक वीर की तरह जीया, वह जिस क्षेत्र से भी जुड़े उन्हें सफ़लता प्राप्त हुई। अशोक ने अपना नाम इतिहास के महान सम्राटों के बीच स्थापित कर दिया है। अध्यात्मिक राह की ओर मुड़ते ही अशोक ने अपना जीवन जनकल्याण के लिए समर्पित कर दिया और अपनी संतानों को भी इसी मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।

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