जानिए क्यों सरकार ने क़ुतुब मीनार के अन्दर जाना वर्जित कर दिया

क़ुतुब मीनार भारत देश में दिल्ली के दक्षिण भाग के महरौली जिले में स्थित है। इस मीनार का प्रथम निर्माण कुतुब उद-दीन-ऐबक ने सन. 1193 में आरंभ करवाया। उसके पश्चात इस मीनार की पाँचवी मंजिल को सन. 1368 में फीरोजशाह तुगलक ने पूर्ण रूप से बनवाया। इस मीनार का नाम ख़्वाजा क़ुतबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर रखा गया है। यह मीनार लाल बलुआ और हलके पीले पत्थरों से बनाई गयी है, जिस पर कुरान के ग्रन्थ एवं फूल पत्तियों की महीन नक्काशी की गई है। क़ुतुब मीनार 73 मीटर ऊँची है और इसका व्यास 14.3 मीटर है, जो ऊपर शिखर पर जाकर 2.7 मीटर हो जाता है। इस मीनार के अन्दर 379 गोल सीढ़ियाँ हैं, सन. 1974 तक इन सीढ़ियों के द्वारा कुतुब मीनार के सबसे उपरी भाग तक जाने की इजाजत थी, परन्तु 04 दिसम्बर सन. 1981 में क़ुतुब मीनार के अन्दर हुए एक हादसे में 45 लोगों की मृत्यु के पश्चात सरकार ने इसके अन्दर जाना वर्जित कर दिया है।

इतिहास

दिल्ली के सबसे पहले शासक कुतुब उद-दीन-ऐबक ने अफगानिस्तान में स्थित जाम की मीनार से प्रेरित होकर और उससे अच्छी ईमारत बनवाने की इच्छा से कुतुब मीनार को बनवाया, परन्तु ऐबक इस मीनार को पूरा नहीं करवा पाए। उसके उपरांत ऐबक के उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने मीनार में तीन और मंजिलें जोड़कर इसका निर्माण करवाया। सन. 1368 में बिजली गिरने की वजह से मीनार की ऊपरी मंजिल क्षतिग्रस्त हो गयी, तब फ़िरोजशाह तुगलक ने इसका पुन: र्निर्माण करवाया, इसके साथ ही फ़िरोजशाह ने दो और मंजिलों का निर्माण करवाया। उसके उपरांत सन. 1505 में एक आए भूकंप की वजह से क़ुतुब मीनार को क्षति पहुंची, जिसको सिकंदर लोदी ने ठीक करवाया। परन्तु सन. 1803 में फिर एक भूकंप आया जिससे कुतुब मीनार को फिर से क्षति पहुंची, तब फिर ब्रिटिश इंडियन आर्मी के मेजर रोबर्ट स्मिथ ने सन. 1828 में इसकी मरम्मत करवाई और साथ ही कुतुब मीनार के सबसे ऊपरी भाग पर एक गुम्बद का भी निर्माण करवाया। कुतुब उद-दीन-ऐबक से लेकर फीरोजशाह तुगलक के जरिये बनवायी गयीं मंजिलें और वास्तुकला की बनावट के बदलावों को यहाँ साफ-साफ देखा जा सकता है। पारसी-अरेबिक और नागरी भाषओं में भी हमें कुतुब मीनार के इतिहास के कुछ अंश दिखाई देते हैं। ढिल्लिका के प्राचीन किले लालकोट के खंडहरों पर इसकी जमीन का निर्माण किया गया था। इस मीनार के निर्माण उद्देश्य के बारे में कहा जाता है कि यह कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद से अजान देने और इस्लाम की दिल्ली पर विजय के प्रतीक रूप में बनाई गई थी।

 

निर्माण कार्य

कुतुब मीनार को कुतुब उद-दीन-ऐबक ने सन. 1193 में बनवाना प्रारंभ करवाया था, परन्तु ऐबक इस ईमारत का निर्माण कार्य पूरा नहीं करवा सके। कुतुब मीनार का पूर्ण रूप से निर्माण सन. 1368 में फिरोजशाह तुगलक ने करवाया था। इस ईमारत का निर्माण करने के लिए लाल और हलके पीले रंग के बलुआ पत्थरों का इस्तमाल किया गया है। इस मीनार में पाँच मंजिलों का निर्माण किया गया है, जिसमें से इस ईमारत की तीन मंजिलों को लाल बलुआ पत्थरों से निर्मित किया गया और अन्य दो मंजिलों को संगमरमर के साथ लाल बलुआ पत्थरों का इस्तमाल करके बनाया गया है। इस मीनार के उपरी भाग तक पहुँचने के लिए इसके अन्दर 379 गोलाकार सीढियों का निर्माण किया गया है।

पर्यटन

कुतुब मीनार को देखने के लिए देश-विदेशों से हजारों की संख्या में लोग आते हैं, जिसमें अक्टूबर से मार्च के महीने में दर्शकों की संख्या सबसे अधिक होती है, क्योंकि यह समय दर्शकों के लिए काफी अच्छा रहता है। इस मीनार में लगे पत्थरों पर की गई नक्कासी और लिखे हुए कुरान के ग्रन्थ, यहाँ आए दर्शकों को काफी लुभाते हैं। इस जगह पर दर्शकों के देखने के लिए कुतुब मीनार के परिसर में एक लौह का स्‍तंभ भी है, जिसकी ऊँचाई 7 मीटर है। यह स्‍तंभ कुतुब मीनार के परिसर के पास बने मस्जिद के समीप स्थित है। इस स्‍तंभ की विशेषता यह है कि सैकडों बर्ष पुराना होने के बावजूद भी इस स्‍तंभ में अभी तक जंग नहीं लगी, इस स्तंभ की यह विशेषता दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

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