वसीम बरेलवी : मुहब्बत नासमझ होती है, समझाना ज़रूरी है

ज़ाहिद हसन (वसीम बरेलवी) एक प्रसिद्ध उर्दू शायर हैं जो बरेली (उप्र) के हैं। इनका जन्म 8 फ़रवरी 1940 को हुआ था। आजकल बरेली कालेज, बरेली (रुहेलखंड विश्वविद्यालय) में उर्दू विभाग में प्रोफ़ेसर हैं।

मुहब्बत नासमझ होती है, समझाना ज़रूरी है 

मुहब्बत नासमझ होती है, समझाना ज़रूरी है
जो दिल में है, उसे आँखों से कहलाना ज़रूरी है

उसूलों पर जहाँ आँच आये, टकराना ज़रूरी है
जो ज़िन्दा हो, तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों [1] को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है, कहाँ जाना ज़रूरी है

थके-हारे परिन्दे जब बसेरे के लिए लौटें
सलीक़ामन्द [2] शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है

बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ [3] टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश [4] रखने को शरमाना ज़रूरी है

सलीक़ा ही नहीं, शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है, तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इसके बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

– वसीम बरेलवी

1. स्वाधिकार, 2. व्यवहारकुशल, 3. सम्बन्ध, 4. आकर्षण ।

साभार – ग़ज़ल संग्रह ‘मेरा क्या’, वाणी प्रकाशन 

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