चुनारगढ़ किला एक अबूझ पहलियों और रहस्यों की कहानी |

अबूझ रहस्यों के कुहासों में डूबा, जिसका जर्रा जर्रा तिलस्म, वैभव, रूमानी कथाओं, वीरों की वीरता भरी लड़ाइयों की भरपूर गाथाओं से भरा, अवंति नरेश भर्तहरी के वैरागी मन को विश्राम देने वाला, जहाँ नैना नाम की एक योगिनी ने कठिन तपस्या की, जहाँ भगवान बुद्ध ने आठवां चतुर्मासा किया, जिस किले पर विक्रमादित्य, पृथ्वीराज से लेकर अकबर तक ने राज किया| सदियों से रहस्यपूर्ण, दुर्जेय, चर्चित तिलिस्मी, अपने अतीत में अनगिनत रहस्य छिपाये, कथालोक का यह किला जिसे चुनार (Chunargarh) के किले के नाम से जाना जाता है, वाराणसी व मिर्जापुर से क्रमश: 42 व 33 कि.मी. दूर गंगा तट पर ऊँची पहाड़ी पर शेर की तरह प्रतीत होता खड़ा है|

दाद देनी पड़ेगी उस वास्तुशिल्पी को, जिसके दिमाग में यहाँ दुर्ग का विचार पहले-पहल उपजा होगा| दूर से दुर्ग का आकार पहाड़ी पर बैठे शेर जैसा लगता है| किले की बनावट ठोस व विलक्षण है| जिस पहाड़ी पर किला बना है, उसकी उंचाई बिल्कुल सीधी है| उस पर न तो नीचे से वार संभव है, न एकबारगी उसके ऊपर जाया जा सकता है| दूर दूर तक फैली किले की उत्तरी प्राचीरें हर तीन मीटर के बाद आड़ी व तिरछी है, ताकि उन पर गोलों का असर ना हो| गोलाबारी और तीरंदाजी के लिए प्राचीरों में काफी सुराखें है| शिल्पशास्त्र में दुर्ग के को लक्ष्ण बताए गए है, उनमें चुनार दुर्ग यधपि मूलत: नादेय दुर्ग है, किन्तु इसमें गिरि, वन, वारि आदि दुर्गों की विशेषताओं का मिला-जुला स्वरूप है| दक्षिण-पश्चिम दिशा में दुर्ग को स्पर्श करती हुई गंगा बहती है और पूरब में जरगों नदी बहती है| ये नदियां दोनों ओर से किले को घेरे है, इसलिए इस किले में परिखा की जरुरत नहीं पड़ी| इन नदियों के बीच विंध्य पर्वत की ऊँची और कटी श्रंखला पर चुनार का यह दुर्ग बना है|

इस किले का स्वामी बनकर ही पूर्व व मध्य भारत पर नियंत्रण रखा जा सकता था| यही कारण था कि खानवा युद्ध विजय के बाद बाबर की नजर इस किले पर भी पड़ी| अकबर के शासन काल में इस किले का राजस्व आठ लाख रूपये था|

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तिलिस्मी कथालोक का यह किला 4×1.5 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में बसा है| प्रवेश के लिए पूर्वोतर और पश्चिमोतर भाग में दो दरवाजे है, जिन्हें पूर्वी व पश्चिमी द्वार कहा जाता है| पूर्वी द्वार मुख्य है| इसमें प्रवेश करने पर लुभाने वाली नक्काशी किये लाल पत्थरों से निर्मित सिंह द्वार मिलता है, सदियां बीत जाने के बाद आज भी सिंह द्वार का सौन्दर्य अप्रितम है| इसे पार करने के बाद भीतरी भाग से सामना होता है| किले की लम्बाई 800 मीटर, चौड़ाई 300 और उंचाई 80 से 175 मीटर है| परकोटे की दीवार की चौड़ाई दो मीटर है| पश्चिम द्वार के पास एक पटल पर अंकित दुर्ग के 76 दर्शनीय स्थल दर्शाए गए हैं| किले में अनेक महल, बारादरी, गहरे कुँए, मंडप, बावड़ी और तहखाने है| बावड़ियाँ व कुँओं का अपना इतिहास है| एक बावड़ी 75-80 मीटर तक गहरी है, जो गंगा नदी से जुड़ी है| सिंह द्वार के आगे सीढ़ीनुमा मार्ग है| फिर महलों, तहखानों की कतार है| किले में फाँसीघर, शीश महल, दरबार ए आम आदि कई जगह है, जो क्षतिग्रस्त हो चुकी| कलात्मक ढंग से निर्मित इस किले में हवाखोरी के लिए कई अच्छी जगह है| मार्ग में कई तहखाने है, जिनका रास्ता सुरंगों से होकर जाता है| कभी ये तहखाने अस्त्र-शस्त्र का भंडार हुआ करते थे| किले में गुप्त काल के अनेक शिल्प है| गोलाकार शोभनीय छत वाला 52 खंभों का सोनवा मंडप दर्शनीय है| जिसका संबंध आल्हा-उदल से है| किवदंती के अनुसार राजा नैनागढ़ (चुनार) ने महोबा के आल्हा की वाग्दत्त पत्नी सोनवां का अपहरण कर लिया था और उससे शादी के लिए ही यह मंडप तैयार करवाया पर आल्हा-उदल ने सोन राजा को हराकर सोनवां को मुक्त कराया था|

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इस किले में एक महत्त्वपूर्ण स्थल राजा भर्तहरी की समाधि है, जिसके अनेक चमत्कारिक आख्यान है| इस समाधि की देखरेख के लिए जो पुजारी है, उसके पास औरंगजेब का 1704 में हस्ताक्षरित फरमान है| फरमान में समाधि की देखरेख के लिए प्रतिदिन एक चांदी का सिक्का देने के निर्देश है| जिसे ब्रिटिश सरकार ने दो रुपया प्रतिदिन कर दिया था|


पी.ए.सी. बटालियन के जवानों के भर्ती व प्रशिक्षण का केंद्र बने इस किले पश्चिमी द्वार पर राज्य सरकार के पुरातत्व विभाग पट्ट लगा है जिस पर किले को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है| दो हजार साल पहले बने इस किले की रूमानी और तिलिस्मी कथाओं की अपनी बानगी है| किले के ऐतिहासिक स्वरूप को बनाये रखने के लिए इस स्थल को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की परम आवश्यकता है| आज भी काफी सैलानी इस किले को देखने आते है|

सन 1888 में प्रकाशित देवकीनंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता (भाग-4), चंद्रकांता संतति (भाग-2) और भूतनाथ (भाग-4) में वर्णित ऐय्यारों द्वारा चुनारगढ़ तिलस्म तोड़ने की कथाभूमि नैनागढ़ यही है|