रामायण के जैन स्वरुप के अनुसार हनुमांजी की हुई है सैकड़ो शादियाँ जाने पूरी कहानी

भगवान हनुमान नहीं थे ब्रह्मचारी, रावण की भांजी से की थी शादी

सम्पूर्ण भारतवर्ष में लोग रामायण और उससे जुड़ी कहानियों के विषय में लगभग सब जानते हैं। सभी इस बात से परिचित हैं कि मान्यता अनुसार भगवान् हनुमान बाल-ब्रह्मचारी थे। वे पवनदेव का अंश थे और भगवान् राम के परमभक्त माने जाते हैं। भगवान् हनुमान ने ही वानर सेना इकठ्ठा करने में भगवान राम की सहायता की थी और वे रावण के साथ हुए युद्ध में उनकी सेना के प्रमुख और ताकतवर योद्धा थे।


मगर रामायण के जैन स्वरुप में भगवान् हनुमान से जुड़ी कई बातें हैरान कर देने वाली हैं। कुछ बातें तो इस हद तक कमाल हैं कि आप भौचक्के रह जाएँगे। रामायण का जैन स्वरुप विमालासुरी द्वारा लिखा या गढ़ा गया है।
वानर-दंपत्ति अंजना और पवनगति के पुत्र थे हनुमान
जैन-रामायण के अनुसार भगवान् हनुमान का जन्म वानर-दंपत्ति अंजना और पवनगति के यहाँ हुआ था।
माना जाता है कि अंजना ने हनुमान को जंगल में जन्म दिया था और फिर वो अपने पुत्र के साथ हनुराहा नाम के एक टापू पर रहने चली गई थी। हनुमान जंगल में ही पले-बड़े और वहीं उनका बचपन बीता।
अलौकिक शक्तियों के मालिक थे भगवान् हनुमान

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ग्रंथ के अनुसार एक बार खेलते-खेलते बालक हनुमान एक पहाड़ से नीचे गिर गए। और चमत्कारी रूप से बिना किसी चोट के वे उठ खड़े हुए, हैरान कर देने वाली बात तो यह थी कि वह पत्थर जिसपर बालक हनुमान गिरे थे, बुरी तरह टूट चुका था। इस घटना के बाद हनुमान के साथ रह रहे लोगों को इस बात पर पूर्ण विश्वास हो गया कि हनुमान के पास दैत्यराज रावण की तरह अलौकिक और चमत्कारी शक्तियां हैं। रावण की ही तरह हनुमान भी अपनी इच्छा से अपना रंग-रूप और कद बदल सकता था।
हनुमान नहीं थे ब्रह्मचारी, रावण की भतीजी से किया था विवाह

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जैन-रामायण के अनुसार भगवान हनुमान ब्रह्मचारी नहीं थे। उन्होंने रावण की बहन चंद्रनाख की बेटी अनंगाकुसुम से विवाह किया था।
किश्किन्दा में रहते हुए की थी लगभग सौ शादियाँ

माना जाता है कि वानरराज सुग्रीव से मुलाक़ात कर जब हनुमान कुछ दिनों के लिए किश्किन्दा में रहे तो वहाँ उन्होंने लगभग 100 शादियाँ की थीं।
जैन रामायण के अनुसार हनुमान नहीं थे राम-भक्त

जैन-रामायण के अनुसार भगवान हनुमान शुरुआत में राम के भक्त नहीं थे। इसके उलट वे तो राम को मार कर अपने ससुर खरदूषण की मृत्यु का प्रतिशोध लेना चाहते थे।
वानरराज सुग्रीव ने करवाई थी राम-हनुमान की भेंट

वानरराज सुग्रीव ने हनुमान को भगवान् राम से मिलवाया और उन्हें सीता के अपहरण के विषय में बताया। इसके बाद से ही हनुमान राम-भक्त बने और उनकी सेवा में जुट गए।
शांतिदूत बनकर पहुंचे थे रावण के दरबार में

जैन-रामायण में लिखा है कि भगवान राम का आदेश मानकर हनुमान, रावण के दरबार में राम के शांतिदूत बनकर पहुंचे थे। वे चाहते थे कि रावण, देवी सीता को भगवान राम के पास सकुशल भेज दे।
रावण ने किया तिरस्कार और छिड़ गई जंग

रावण के दरबार में शांति का सन्देश लेकर गए हनुमान का भरी सभा में तिरस्कार हुआ। रावण ने उनकी बात को सिरे से नकार दिया और परिणामस्वरुप युद्ध का शंखनाद हुआ। इस युद्ध में अपना कर्तव्य निभाते हुए हनुमान, राम की तरफ से रावण के खिलाफ लड़े।