व्यक्तित्व या चरित्र के 7 प्रकार, जानिये एक रहस्यमयी ज्ञान

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ज्योतिष अनुसार राशियों के आधार पर 12 प्रकार के व्यक्तित्व हो सकते हैं। तंत्र शास्त्र के अनुसार भी लगभग 12 तरह के लोग होते हैं। समुद्रशास्त्र अनुसार व्यक्तित्व के और भी कई प्रकार होते हैं  जो पशु और पक्षियों के आधार पर हैं। शरीर रचना विज्ञान के अनुसार व्यक्तित्व के अन्य प्रकार होते हैं, जैसे गठिला, शक्तिहीन, खिलाड़ी आदि।

समाजशास्त्र के अनुसार व्यक्ति के राजनीतिज्ञ, धार्मिक आदि इस तरह के प्रकार होते हैं। मनोविज्ञान के अनुसार तीन प्रकार के व्यक्तित्व होते है,  अन्तर्मुखी, बहिर्मुखी और मध्यमुखी। इसी तरह योग और धर्म में भी व्यक्तित्व के कई प्रकार बताएं गए हैं।

ओशो ने अपने एक प्रवचन में कहा है कि ‘व्यक्तित्व को हम दो श्रेणियों में बांट सकते हैं। एक जिसे मनोविज्ञानी टी-व्यक्तित्व कहते हैं, विषैला, और दूसरा जिसे वे एन-व्यक्तित्व कहते हैं, पुष्टिकर  विषैला व्यक्तित्व हमेशा चीजों के प्रति नकारात्मक नजरिया रखता है। विषैला व्यक्तित्व हमेशा सुंदर चेहरों के पीछे छिपता है।”

खैर.. हम उपरोक्त में से किसी भी तरह के व्यक्तित्व के बारे में नहीं बताना चाहते हैं। हम आध्यात्मिक रूप में हिन्दू धर्म में बताए गए चक्र के आधार पर यह बताना चाहते हैं कि कौन से चक्र में सक्रिय चेतना का कैसे व्यक्तित्व होगा। इसे ऐसा समझे की सात मंजिलें हैं। उन सात मंजिलों में से आप जिस भी मंजिल में रहते हैं आप उस तरह के व्यक्तित्व के सांचे में ढल जाते हैं।

क्या होता है चक्र?
वैसे तो ‘चक्र’ का मतलब पहिया या गोलाकार होता है। चूंकि इसका संबंध शरीर में एक आयाम से दूसरे आयाम की ओर गति से है इसलिए इसे चक्र कहते हैं, पर वास्तव में ये एक गोलाकार भी होते हैं और त्रिकोण भी। इसी तरह हमारे शरीर में हजारों ऊर्जा के भंवर चक्कर काट रहे हैं किसी गैलेक्सी की तरह लेकिन उनमें भी 114 चक्रों को मुख्‍य माना गया है।  इन 114 में से भी मोटे तौर पर 7 चक्रों की सबसे ज्यादा चर्चा की गई है, जहां ऊर्जा वर्तुलाकार में चक्कर लगा रही है जिसके कारण हमारा जीवन चलता है। विज्ञान ने भी इन चक्रों की सूक्ष्म उपस्थिति को माना है। भारतीय पारंपरिक औषधि विज्ञान के अनुसार ये चक्र सुप्तावस्था में रहते हैं, हालांकि ये ऊर्जा के केंद्र हैं।

ये 7 चक्र हैं- मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार।  

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कौन-सा चक्र कहां पर : पहला चक्र है मूलाधार, जो गुदा और जननेंद्रिय के बीच होता है। स्वाधिष्ठान चक्र जननेंद्रिय के ठीक ऊपर होता है। मणिपूरक चक्र नाभि के नीचे होता है। अनाहत चक्र हृदय के  स्थान में पसलियों के मिलने वाली जगह के ठीक नीचे होता है। विशुद्धि चक्र कंठ के गड्ढे में होता है। आज्ञा चक्र दोनों भवों के बीच होता है जबकि सहस्रार चक्र,  जिसे ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं, सिर के सबसे ऊपरी जगह पर होता है, जहां नवजात बच्चे के सिर में ऊपर सबसे कोमल जगह होती है।

साधना करने पर यह ऊर्जा मूलाधार से सहस्राकार में पहुंच जाती है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति साधना नहीं करता है तब क्या होता है? तब जिस व्यक्ति को बचपन से जैसे संस्कार और विचार दिए गए हैं  उस अनुसार उसकी ऊर्जा का केंद्र कोई एक चक्र बन जाता है। इसका यह मतलब नहीं कि उस केंद्र पर ऊर्जा एकत्रित होने से वह चक्र सक्रिय हो गया हो और वह  व्यक्ति उस चक्र की सिद्धि प्राप्त कर गया हो। यहां प्रस्तुत है चक्रों पर सक्रिय ऊर्जा के अनुसार व्यक्ति का स्वभाव और निर्मित होता भविष्य.

मूलाधार चक्र : जिनके जीवन में भोजन, निद्रा और सेक्स सबसे प्रबल है वे सभी इसी चक्र के अनुभवों को भोगते रहते हैं और अंतत: अपना जीवन किसी पशुवत विचार की तरह जीकर मर जाते हैं। ऐसे लोग बुद्धि से  नहीं, भावना से काम लेते हैं। ऐसे लोगों का भविष्य पशुओं की भांति ही होता है। हालांकि मूलाधार पर ऊर्जा के गड़बड़ होने के कारण व्यक्ति की प्राकृतिक भूख और नींद में भी गड़बड़ी हो जाती है। यह भी हो सकता है कि व्यक्ति ज्यादा हिंसक हो और उसमें तामसिक प्रवृत्ति का बोलबाला हो। दुनिया में बहुत ही सतही विचारधारा के लोगों की संख्या ज्यादा है चाहे वह राजनीति में हो, साहित्य में या फिल्मों में। गौर से देखने पर सभी भोजन, नींद और सेक्स की ही चर्चा कर रहे हैं।

स्वाधिष्ठान : कुछ लोगों की ऊर्जा स्वाधिष्ठान में ज्यादा सक्रिय रहती है इसीलिए उनके जीवन में आमोद-प्रमोद का ज्यादा महत्व रहता है। वे भौतिक सुख-सुविधाओं की और दौड़ते रहते हैं।   हर चीज का लुत्फ उठाते रहते हैं। मनोरंजन ही जीवन बन जाता है। यात्रा, राग, नृत्य और संगीत ही जीवन बना रहता है।   हालांकि यहां पर ऊर्जा की गड़बड़ी से जीवन में आलस्य बढ़ता, कर्मठता कम हो जाती है। हो सकता है कि व्यक्ति शराब और मौज-मस्ती में ही जीवन बिता दे और अंतत: पछताए।

मणिपुर चक्र : अगर आपकी ऊर्जा मणिपुर चक्र पर ही ज्यादा सक्रिय है, तो आप में कर्म की प्रधानता रहेगी। ऐसे व्यक्ति को कर्मयोगी कहते हैं। ऐसा व्यक्ति ‍दुनिया का हर काम करने के लिए हमेशा तैयार रहता है।

अनाहत चक्र : ज्यादातर सृजनशील लोग अनाहत चक्र में जी रहे होते हैं। ऐसे लोग संवेदनशील किस्म के होते हैं। वे लोगों की भावनाओं की कद्र करते हैं। चित्रकार, लेखक, मूर्तिकार आदि लोग इसी श्रेणी में आते हैं।

विशुद्धि चक्र : विशु्द्धि चक्र में ऊर्जा का सक्रिय होना इस बात का सबूत है कि आप अति शक्तिशाली हैं शारीरिक और मानसिक दोनों ही रूप से। ऐसा व्यक्ति निर्भीक और ईमानदार होता है।

आज्ञा चक्र : बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने जीवन को बहुत महत्व दिया है और जो हर कार्य और व्यवहार को बौद्धिक स्तर से करते हैं तो यह माना जाएगा कि उनकी ऊर्जा आज्ञा चक्र पर ज्यादा सक्रिय है।   बौद्धिक अनुभव से शांति मिलती है। ऐसे व्यक्ति के आस-पास चाहे कुछ भी हो रहा हो या कैसी भी परिस्थितियां निर्मित हो रही हों, उससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। निर्भीकता उसका स्वाभाविक गुण है।  हालांकि ऊर्जा की गड़बड़ी से बौद्धिक अहंकार पैदा होता है, जो कु‍बुद्धि और कुतर्कों की ओर ले जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए समाज और राष्ट्र को दिशाहीन कर देता है।

सहस्रार : बहुत कम लोग हैं जिनकी ऊर्जा सहस्रार पर ज्यादा सक्रिय रहती है। ऐसा व्यक्ति सदा आनं‍दित रहता है। सुख-दुख का उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता। बिना कारण ही व्यक्ति खुश रहता है।

 

 

 

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